जरा सी आजादी का भ्रम

सदियों से कैद में रही लड़कियों की,
जब जंजीर की एक कड़ी ढीली की जाती है,
तो समाज अपनी पीठ थपथपाता है..देखो हमने उन्हें आज़ादी दे दी।

कितना दयालु है यह समाज
जो उन्हें साँस लेने की इजाज़त देता है?
बस उतनी ही, जितनी दीवारों से टकराकर लौट आए।

उन्हें स्कूल भेज दिया जाता है, कॉलेज भेज दिया जाता है
और कहा जाता है कि “देखो अब तो बराबरी आ गई”,
मानो शिक्षा कोई उपहार हो, अधिकार नहीं।

वे पढ़ती हैं, समझती हैं,
पर हर समझ के पीछे एक ‘मर्यादा’ की दीवार खड़ी की जाती है
इतना ही सोचो, इतना ही बोलो, इतना ही सपने देखो।

धीरे-धीरे वही लड़कियाँ मानने लगती हैं कि यही ‘काफी’ है।
उन्हें लगता है कि माँ बाप ने जो विश्वास दिखाया
उसी में उनका समूचा अस्तित्व समा जाना चाहिए।
खुद की इच्छा, अपने सपने, अपनी पसंद
ये सब अवज्ञा लगने लगते हैं।

और समाज इस संयमित आज़ादी पर गर्व करता है
कहता है कि देखो हमारी बेटियाँ कितनी संस्कारी हैं
छी! ये कैसा संस्कार?
जो अपने हक़ को भी एहसान समझें?

वे पढ़ाई में आगे बढ़ती हैं
पर सोच अब भी कैद रहती है।
उनके कदम बाहर निकलते हैं
पर दिल अब भी चौखट के भीतर धड़कता है।

और जब कोई लड़की अपने मन की बात कहने की कोशिश करती है,
तो वही समाज फुसफुसाता है कि इतनी भी आज़ादी अच्छी नहीं होती।

यह कैसी आज़ादी है
जहाँ हाँ बोलने से पहले पिता की अनुमति चाहिए,
जहाँ सपनों का आकार घर की इज़्ज़त मापता है,
जहाँ औरतें आज भी अपने ही पंख काटकर उड़ान का नाम देती हैं संस्कार को।

शायद सबसे बड़ी कैद वह होती है,
जो दिखती नहीं 
जो मन में बसाई जाती है
जहाँ लड़कियाँ खुद ही अपने भीतर कहती हैं....
कि
बस इतना ही बहुत है।

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