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धीमी जिंदगी के 10 रुपए

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हर वह इंसान जो घर से दूर रहता है, दीवाली का इंतज़ार किसी त्योहार की तरह नहीं, बल्कि किसी वापसी की तरह करता है। मैं भी उन्हीं में से एक था एक ऐसा मुसाफ़िर,  जो लौटना चाहता था, सिर्फ़ अपने घर नहीं,  अपने भीतर के गाँव में भी। शहर की चकाचौंध छोड़ जब मैं दिल्ली शहर से अपने गाँव की ओर निकला,  तो मन में एक अनजानी शांति थी। वहां से एटा की बस पकड़ी, फिर एटा से एक प्राइवेट बस… वही पुरानी देहाती बस, जिसमें सीटों से ज़्यादा सवारियाँ  और हर सीट पर किसी न किसी की गठरी, थैला, टोकरी।  आधा घंटा इंजन के मूड का इंतज़ार करने के बाद बस चली,  और अगले घंटे भर में मुझे मेरे कस्बे सिद्धपुरा तक पहुँचा दिया। अब गाँव बस तीन किलोमीटर दूर था।  सोचा, ई-रिक्शा से निकल चलता हूँ। ई-रिक्शा में सामान्यतः पाँच सवारी बैठती हैं, लेकिन गाँव का ‘सामान्य’ शहर से अलग होता है शायद। ड्राइवर ने पीछे छह लोग बिठा दिए और आगे, अपने साथ और दो लोग। मैं पहले बीच में ठूँस दिया गया, पर मेरे पैर संभल न सके। उसने मुस्कराते हुए कहा, “भैया, आप आगे बैठ जाओ, पैर लंबा है आपका। बैग दे दो, ऊपर रख दूँ।” ...